1857 की क्रांति से लगभग 100 वर्ष पहले
भारत में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध
संन्यासियों ने भी विद्रोह किया था,,,
लेकिन इतिहास में इसका तनिक भी
उल्लेख नहीं किया गया है,,, और है भी तो
चंद पंक्तियों में ही उल्लेख और इतिश्री कर
दिया गया है,,,
जी हां,,, 1757 में प्लासी युद्ध जीतने के बाद अंग्रेजी शासन का प्रभाव भारत में बहुत तेजी के साथ बढ़ने लगा,,,
और 1764 में हुए बक्सर युद्ध ने उन्हें बंगाल बिहार और उड़ीसा का वास्तविक शासक बना दिया,,,
यह युद्ध मुगल सम्राट शाह आलम बंगाल के नवाब मीर कासिम तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला की संयुक्त सेनाओं तथा अंग्रेजों के मध्य हुआ जिसमें अंग्रेजों ने संयुक्त सेना को हरा दिया,,,
उसके पश्चात,,,
भारत के संपूर्ण उत्तर पूर्वी भाग पर उनके क्रूर और दमनकारी शासन का आरम्भ हुआ था,,,
और यहीं से शुरू हुई थी देश के संन्यासियों की अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत,,,
जिसे इतिहास के पन्नों में संन्यासी विद्रोह लिख कर चंद पंक्तियों में सिमटा दिया गया है,,,
जबकि यह विद्रोह 1770 से 1800 तक चला था,,,
1770 में जब भीषण अकाल से कांप गया था बंगाल, उसके बाद भी अंग्रेजों के जुल्म बंद नहीं हुए,,, और वो लगातार जनता का शोषण करते रहे,,,
और
फिर उठ खड़े हुए संन्यासी,,,
1776 में संन्यासी विद्रोह का प्रमुख केंद्र पटना बना ,,,यहाँ करीब 5000 के करीब संन्यासियों की संगठित सेना ने ईस्ट इंडिया कंपनी अर्थात भारत के नये नवेले अंग्रेजी शासन को धता बताया,,,
पटना में मुह की खाकर भागे अंग्रेज,,,
इसी से डरा सहमा गवर्नर जनरल लार्ड वारेन हेस्टिंग्स घोषणा करता है कि जिसने भी इन संन्यासी विद्रोहियों को शरण दिया अथवा इनकी सूचना हम तक नहीं पहुँचायी उसे हम गुलामों की तरह विदेशों में बेंच देंगे,,,
इसी घोषणा से दब कर तत्कालीन छोटी रियासतों ने संन्यासी विद्रोह को मदद देना बंद कर दिया,,, और 1800 आते आते ये विद्रोह कमजोर हो गया,,,
जबकि ,,,
यदि सुचारु रूप से संगठित होकर हमला किया गया होता तो अंग्रेज़ी शासन यहाँ स्थापित ही नहीं हो पाता,,,परंतु निहित स्वार्थ और कायरता से वशीभूत होकर इसी देश के लोगों ने अंग्रेजों की भरपूर मदद किया,,,
फिलहाल,,,
लगातार 30 वर्षों तक चली इस खूनी बगावत को इतिहास के पन्नों से ही गायब कर दिया गया है,,,और पढ़ाया जाता है नेहरू के झूठों का पुलिन्दा,,, गांधी के सत्य की खोज,,,
जबकि इन दोनों का बहुत बड़ा हांथ है इतिहास के सत्य को ही दबाने में,,,
जबकि इस घटना के सौ वर्ष बाद बंकिम चंद्र चटर्जी जी ने इसी संन्यासी विद्रोह के ऊपर अपना उपन्यास "आनंद मठ" लिखा है,,,
समय हो तो उस महान पुस्तक को आप सभी लोग जरूर पढ़िएगा,,,!!

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